राजस्थान के दूर-दराज और वंचित क्षेत्रों में एक नई, वैज्ञानिक आंकड़ों पर आधारित तथा समुदाय- संचालित पहल से टीबी की पहचान और निरंयत्रण में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
राजस्थान के जनजातीय जिलों जैसे अनेक दूर-दराज के क्षेत्रों में तपेदिक एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है। दुर्गम भौगोलिक क्षेत्र, जागरूकता का निम्न स्तर, सामाजिक कलंक, मौसमी प्रवासन और रोग का देर से निदान जैसे कारकों ने लंबे समय से तपेदिक नियंत्रण के प्रयासों में बाधा उत्पन्न की है और तपेदिक के बोझ को बढ़ाया है।
इस समस्या के समाधान के लिए एम्स जोधपुर ने जनजातीय आबादी में टीबी के सक्रिय और गुप्त मामलों के बोझ तथा टीबी-रोधी दवाओं के प्रतिरोध के स्वरूप का आकलन करने के लिए क्लस्टर-आधारित जनसंख्या सर्वेक्षण, सक्रिय रोगी खोज और प्रयोगशाला परिक्षण किए।
इस अध्ययन में दक्षिणी राजस्थान के जनजातीय जिलों में टीबी के संक्रमण को सीमित करने के उपाय सामने आए हैं। इसके तहत समुदाय की भागीदारी के माध्यम से रोग की शीघ्र पहचान, निवारक जांच के लिए रोगियों को सुव्यवस्थित रूप से भेजना तथा समय पर उपचार उपलब्ध कराना शामिल है।
चित्र:फील्ड वर्क- स्क्रीनिंग, बलगम संग्रह, ट्रांसपोर्ट और स्वास्थ्य जागरूकता
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के सीड (एसईईडी) प्रभाग के सहयोग से शोधकर्ताओं ने सिरोही, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ और बांसवाड़ा जिलों के 6000 से अधिक लोगों के बीच घर-घर सर्वेक्षण, लक्षणों की जांच, बलगम परीक्षण, राष्ट्रीय तपेदिक उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के अंतर्गत निदान और आंकड़ों का विश्लेषण किया।
एम्स जोधपुर के फार्माकोलॉजी विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. शोबन बाबू वर्थ्या के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने लोगों को टीबी के प्रति जागरूक करने के लिए कार्यशालाओं का आयोजन किया। उन्होंने शुरूआती पहचान में सुधार लाने के लिए महामारी विज्ञान सर्वेक्षण, स्वास्थ्यकर्मियों और पंचायत स्तर के प्रतिनिधियों को जमीनी स्तर पर एक साथ जोड़ा। इसके साथ ही सक्रिय मामलों की तलाश और प्रयोगशाला सत्यापन का काम भी किया।
जिन लोगों में तपेदिक के लक्षण पाए गए तथा जिनके परीक्षण के परिणाम पॉजिटिव आए, उनकी पहचान कर राष्ट्रीय दिशानिर्देशों के अनुसार टीबी का उपचार किया गया। इसके अतिरिक्त, टीबी (तपेदिक) के बारे में लोगों की समझ में सुधार लाने के लिए सामुदायिक जागरूकता पैदा की गई। इसके शीघ्र रोग पहचान तथा परिवार के संपर्क में रहने वाले व्यक्तियों की निवारक जांच के लिए रोगियों को सव्यवस्थित रूप से भेजने के माध्यम से टीबी के संक्रमण को सीमित करने में सहायता मिली। इससे वैज्ञानिक आंकड़ों के उपयोग से ‘टीबी मुक्त पंचायत’ मॉडल के कार्यान्वयन को सक्षम बनाने में मदद मिली।
यह पहल दर्शाती है कि लक्षित, वैज्ञानिक अनुसंधान किस प्रकार ऐसे उपयोगी आंकड़े तैयार कर सकता है, जो सीधे नीतिगत निर्णयों के लिए उपयोगी हों तथा संवेदनशील आबादी में टीबी नियंत्रण को मजबूत कर सकें।
